मानव सभ्यता के साथ-साथ कलाओं का विकास और पोषण हुआ संसार की चौसठ कलाओं में संगीत कला का विशेष महत्व है क्योंकि संगीत एक ऐसी कला है जो मनुष्य के हृदय में सोए आंतरिक भावों को जागृत करने में सक्षम है।यह एक ऐसी कला है जो जड़ चेतन पर अपना प्रभाव छोड़ने में सक्षम है।
कला का मूल अर्थ काफी व्यापक और सर्वभौम है।कला के बिना व्यवस्थित मानव जीवन, समाज या देश की कल्पना भी नही की जा सकती है।यह मानव जीवन का एक ऐसा अविभाज्य अंग है जो जन्म से मृत्यु तक साथ निभाती है।कला ही जीवन का सौंदर्य है।शून्य से शिखर तक कला का संयोग बना रहता है। उसमें संगीत जैसी विद्या में कला संगीत को और संगीत कला को पूर्ण करती है।
वैदिक काल में संगीत वैदिक ऋचाओं के गान में समाहित था। धीरे-धीरे संगीत -साधना से मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम बन गया ।मध्यकाल में राजाओं ,रियासतों में मनोरंजन के साथ-साथ अर्थोपार्जन का भी श्रोत बन गया। आज के अर्थयुग में संगीत कला के साथ-साथ अर्थोपार्जन का सशक्त माध्यम बन गया है।संगीत धर्म, अर्थ,काम,और मोक्ष से विलग हो कर धन,मान, यश पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त करने का साधन मात्र रह गया है। इसमें कतई सन्देह नहीं कि संगीत आज स्वछंद विचरण कर रहा है और अपनी कलात्मकता तथा मनोरंजकता के कारण व्यवसाय और अर्थोपार्जन का मुख्य स्रोत होते हुवे पूरे विश्व पर राज कर रहा है।
आधुनिक काल में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संगीत का उत्तरोत्तर विकास होता चला आ रहा है। पहले संगीत शिक्षण से सम्बंधित जितनी सरकारी ग़ैरसरकारी संस्थाएँ हुआ करती थी, उनमे संगीत के स्तर को बनाए रखने के लिए संगीत मनीषियों द्वारा एक श्रेष्ठ कलाकार और एक श्रेष्ठ संगीतकार का सृजन किया जाता था,जो संगीत की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए संगीत कला में व्यवसाय से अधिक संगीत कला का प्रचार- प्रसार और उचित दिशा प्रदान करने के लिए क्रियाशील रहा करते थे। संगीत के विकास से सम्बंधित इस कार्य ने संगीत को जन-जन तक पहुंचाया,किन्तु इससे संगीत कला को आंतरिक क्षति भी पहुँची।
सरकारी तथा ग़ैरसरकारी संस्थाओं द्वारा संगीत को जन-जन तक पहुँचाने में व्यक्तिगत संगीत संस्थाओं, मान्यताप्राप्त संस्थाओं, विद्यालयों तथा महाविद्यालयों ने अहम भूमिका निभाई है।संगीत को पाठ्यक्रम का मुख्य अंग बना दिया गया है।बच्चों में संगीत के प्रति रुचि बढ़ी है। यह भी सत्य है कि शिक्षण क्षेत्रों में या अन्य विभागों में संगीत-सम्बंधित पद पाने की चाह ने संगीत में डिग्री पाने की लालसा को बढ़ाया है।आज सरकारी तथा ग़ैरसरकारी संस्थाओ में संगीत शिक्षक के पदों के लिए विज्ञापन तथा आवेदन दिए जाते हैं जिससे संगीत में रोजगार का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
वर्तमान में ऐसे अनेक ग़ैरसरकारी संस्थाएँ हैं जिनमें संगीत -शिक्षण तथा कला और कलाकारों के सम्बर्धन के लिए कार्य किये जाते हैं।सरकारी स्तर पर राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार के ऐसे कई विभाग हैं जिनमें गायन ,वादन,तथा नृत्य से सम्बंधित पद हैं जो संगीत के माध्यम से प्रचारात्मक कार्य करता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के विभिन्न विभागों द्वारा संगीत के माध्यम से सरकारी नीतियों का प्रचार -प्रसार के लिए विभागीय, सूचिबद्ध और पंजीकृत कलाकारों का चुनाव करती है जिससे अति साधारण कलाकार या संगीत का अल्प ज्ञान रखने वाले कलाकारों को भी संगीत के द्वारा रोज़गार कर अपना जीवनयापन करने में सहायता करती है। इस क्षेत्र में ,गीत एवं नाटक प्रभाग, क्षेत्रीय प्रचार निदेशालय, आकाशवाणी, दूरदर्शन, इत्यादि विभागों ने काफी सराहनीय कार्य किये हैं।
इसके अतिरिक्त विगत कुछ दशकों से संगीत के माध्यम से धन और यश प्राप्ति में दूरदर्शन के अतिरिक्त प्राइवेट चैनलों ने अहम भूमिका निभाई है।संगीत के कार्यक्रम लगभग सभी चैनलों पर चलाए जाते हैं जिसमें सभी उम्र के कलाकारों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से संगीत में व्यवसाय बनाने और संगीत की रिकॉर्डिंग,टेलीकास्ट, एडिटिंग इत्यादि से सम्बंधित विषयों की जानकारी रखने वालों को भी रोज़गार के अवसर कला के माध्यम से प्राप्त हो रहे हैं। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि संगीत अब मात्र व्यवसाय बन कर रह गई है।
संगीत सम्बंधित सरकारी-ग़ैरसरकारी सम्मेलनों तथा व्यक्तिगत कार्यक्रमों में संगीत कला के व्यवसायीक स्वरूप का पोषण किया है। इन सम्मेलनों के माध्यम से न केवल कलाकार अपितु व्यवस्थापकों और संरक्षकों का आर्थिक सम्बर्धन संगीत कला के माध्यम से होता है।अतः संगीत कला के विकास और पोषण में सरकारी और ग़ैरसरकारी संस्थाओं द्वारा जो भूमिका निभाई जा रही है वह काफ़ी प्रसंशनीय तथा उपयोगी है।किंतु यह भी सत्य है कि संगीत कला के माध्यम से अर्थोपार्जन मात्र न रह कर इसके मूल स्वरूप और स्तर को बनाए रखने के प्रयास में भी सार्थक कदम उठाए जाने चाहिए…….✍️
डॉ शिप्रा