हमारे ऋषि -मुनियों ने योग के द्वारा शरीर, मन और प्राणों की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए आठ प्रकार के साधनों की चर्चा की है, जिसे ‘अष्टांग योग’ कहते हैं।महर्षि पतंजलि ने इसका वर्णन करते हुए कहा है कि योग के आठों अंग-यम,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि एक कड़ी के समान जुड़े-गुथे एक दूसरे पर निर्भर और एक -दूसरे के पूरक हैं।चित्त की चंचलता तथा दुर्बलता को दूर कर मन का स्थिर तथा सबल होना ही योग है।
प्राणायाम के सफल परिणाम के लिए दिनचर्या का भी बड़ा महत्व है।शुद्ध सात्विक भोजन,जल्दी सोने-जगने का अभ्यास योगाभ्यास पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।योगासन की स्थिरता का अभ्यास प्राणायाम को पूर्णता प्रदान करते हैं।अतः प्राणायाम करते वक़ आसन की स्थिरता अति आवश्यक है।
प्राणायाम है प्राणों का आयाम
योग जीने की कला है और प्राणायाम योगासन की एक वैज्ञानिक पद्धति। योगासन और प्राणायाम से हमारी रक्त नलिकाएं शुद्ध हो जाती है, फेफड़े खुल जाते हैं।फेफड़ों की मांसपेशियों में लचक आ जाती है, जिससे उसके फैलने-सिकुड़ने की शक्ति बढ़ जाती है। प्राणवायु का शरीर में प्रविष्ट होना श्वांस है और बाहर निकलना प्रश्वास, इन्हीं दोनों गतियों को संयमित करना प्राणायाम है।
प्राणायाम का अर्थ है– प्राण का आयाम,यानि प्राण का विस्तार करना।प्राणायाम का उद्देश्य शरीर में व्याप्त प्राण शक्ति को उत्प्रेरित, संचारित, नियंत्रित और संतुलित करना है। इससे हमरा शरीर और मन नियंत्रण में आता है।हमारे निर्णय करने की शक्ति बढ़ जाती है।शरीर की शुद्धि के लिए जैसे स्नान की आवश्यकता होती है उसी प्रकार मन की शुद्धि के लिए प्राणायाम आवश्यक है।प्राणायाम से हम स्वस्थ, निरोग होते हैं साथ ही दीर्घायु भी होते हैं।हमारी स्मरण शक्ति बढ़ती है और मस्तिष्क के रोग दूर होते हैं। प्राणायाम एक आंतरिक योगाभ्यास है जिससे नाड़ियाँ शुद्ध होती है और हमारे स्नायु तंत्र को शक्ति मिलती है।मन की चंचलता दूर होती है और मन को इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने में सफलता प्राप्त होती है।
प्राणायाम प्रारंभ करने से पूर्व यह आवश्यक है कि हम मानव शरीर में हो रहे प्राणवायु के संचार को भली भाँति समझ लें क्योंकि जब यही प्राणवायु अवरुद्ध होती है तो जीवन लीला समाप्त हो जाती है।अतः इस अदृश्य जीवन(प्राण) को भली भांति समझ लेना आवश्यक है। नाक के बाएं और दाहिने छिद्र द्वारा स्वांस-प्रश्वास की क्रिया होती है।बायें नाक के श्वास को चन्द्रनाड़ी और दाहिने को सूर्यनाड़ी कहते हैं।दोनों प्राण-प्रवाह अंदर मिलकर जो तीसरा प्राण बनाते हैं वो सुषुम्ना नाड़ी कहलाते हैं।मेरुखण्ड के मध्य स्थित इस सुषुम्ना नाड़ी का शरीरिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से काफी महत्व है।
प्राणायाम केवल सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया नही है।प्राणायाम प्राणवायु को संचित कर,जहाँ एक ओर शरीर के आंतरिक अंगों को प्रभावित करता है, उसे स्वस्थ बनाता है, वहीं दूसरी तरफ ध्यान और ध्यान से समाधि तक कि यात्रा को सुगम बनाने की अचूक विधि भी है।अतः प्राणायाम के वक़ पूरा ध्यान सांस पर रखा जाता है।प्राणायाम हमेशा शुद्ध और शान्त वातावरण में किया जाना चाहिए। इसके अभ्यास का समय प्रातःकालीन ब्रह्मबेला को सर्वोत्तम माना गया है।नित्त -क्रिया से निव्रित हो कर खाली पेट इसका अभ्यास किया जाना चाहिए ।प्राणायाम में सांस की तीन क्रियाएँ की जाती हैं-
1)बह्यवृति (रेचक):-प्राणवायु यानि साँस को बाहर निकलना बह्यवृति या रेचक कहलाता है।
2)आभ्यंतर वृत्ति(पूरक):-साँस का शरीर के भीतर आना या लेना आभ्यंतर वृत्ति या पूरक कहलाता है।
3)स्तम्भ वृत्ति(कुम्भक):-साँस का स्थिर हो जाना स्तम्भ वृत्ति या कुम्भक कहलाता है। इसके अंतर्गत दो विधियाँ हैं– एक रेचक करते समय साँस को बाहर ही रोके रखना बाह्य कुम्भक और दूसरा साँस भर कर अंदर में रोकना आंतरिक कुम्भक कहलाता है।
योगग्रन्थों में प्राणायाम के लगभग पचास प्रकार बतलाए गए हैं।जिनमे अनुलोमविलोम, नाड़ीशोधन, अग्निसार, कपालभाति, भस्त्रिका, भ्रामरी,उज्जयिनी,सूर्यभेदी, चन्द्रभेदी, शीतकारी इत्यादि प्राणायाम नियमित प्रयोग में आते हैं।
नियम और सावधानी
योग में दिनचर्या का बड़ा महत्व है।अतः जबतक दिनचर्या सन्तुलित नही होगी योग का समुचित प्रभाव नही परिलक्षित होगा।योग एक कठिन अभ्यास है, किन्तु दुरूह होने पर भी सिद्ध योगी द्वारा बताई गई प्रणाली से अत्यंत सरल हो जाती है।यह एक प्रायोगिक विषय है, जिसे केवल शाब्दिक ज्ञान से उपयोग नहीं बनाया जा सकता।योग के रहस्य तथा मानव देह की उपादान शक्ति का ठीक-ठीक अनुमान लगाए बिना योग क्रिया करना या करवाना अनुचित है।योग शिक्षक द्वारा सीखे जाने पर यह पूर्ण साध्य बन जाता है।जैसे -जैसे मनुष्य प्राणायाम का अभ्यास करता है वैसे -वैसे उसके संचित कर्म-संस्कार, क्लेश आदि दुर्बल होते चले जाते हैं।एक स्वस्थ शरीर मे स्वस्थ मन और स्वस्थ मन मे स्वस्थ शरीर का रहस्य छिपा होता है।योग शरीर, मन और चेतना इन तीनो के विकास का एक समन्वित साधन है। इसका उद्देश्य है कि मानव तीनों से सम्बंधित क्षमताओं का पूर्ण रूप से विकास करे,क्योंकि इसके बिना आत्मज्ञान भी सम्भव नहीं।शरीर ही सभी प्रकार के धर्मों के आचरण का मुख्य साधन है।योग में शरीर की साधना के साथ मोक्ष के साधन भी अनवरत रूप से चलते रहते हैं।
✍️ डॉ शिप्रा
बहुते बढ़िया।
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😊🙏
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शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम् I
परमात्मा का एक बहुमूल्य उपहार और माता एवं पिता के पुण्य से प्राप्त इस साधन के महत्व को समझना वर्तमान समय में और प्रासंगिक है ।
इस संदर्भ में यह आपके द्वारा एक उत्तम आलेख की प्रस्तुति है।
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बहुत धन्यवाद मनोबल बढ़ाने के लिए😊🙏🌹
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