
संगीत के विकासक्रम में वैदिक काल सबसे प्राचीन है।वेद भारतीय संस्कृति का मूल आधार है।वैदिक मतानुसार संगीत की उत्तपत्ति सृष्टि के सृजन के साथ हुई। अनन्त काल से सतत गुंजायमान ॐ ही आदि नाद है। अ, उ, म, तीन अक्षरों के समावेश से बना ॐ त्रिदेवों क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश का द्योतक है।ब्रह्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की,विष्णु पालक और महेश संहारकर्ता हुवे।इन त्रिदेवों के क्रिया कलाप से सृष्टि से संहार तक कि प्रक्रिया अनन्त काल से अनवरत चलती आ रही है।शास्त्रानुसार ब्रह्मदेव के चारो मुख से चार वेदों– ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद की उत्तपत्ति हुई।
सभी वेदों का ज्ञानाजर्न गुरुकुल के अंतर्गत होता था।चारों वेदों में संगीत का सम्बंध सामवेद से है जिसके सभी मन्त्र गेय हैं। सामवेदी गेय पदों को उदात्त, अनुदात्त और स्वरित, इन तीनों स्वरों में ही गाये जाते हैं और इन्हीं तीन स्वरों से क्रमशः सातों स्वर,सा, रे,ग, म,प,ध,नी की उत्तपत्ति हुई।इस प्रकार संगीत के सातों स्वर, बाईस श्रुति, और रागों की उत्तपत्ति विकास की एक प्रक्रिया का परिणाम है। वैदिक काल में यज्ञादि में जिन मंत्रो का व्यवहार होता था उनमे सबसे अधिक शब्द- श्रुति प्रचलित थे।शिक्षण-पद्धति श्रवण और अनुकरण पर हुआ करती थी। गुरु के द्वारा गाये गए वैदिक ऋचाओं को सुनकर उसका गायन किया जाता था।
वैदिक साहित्य में ‘साम’ को संगीत माना गया है।भारतीय संगीत शास्त्र भी साम संगीत का मूल आधारित ग्रन्थ माना है। शारंगदेव ने संगीत रत्नाकर में कहा है,“साम्वेदादिद गीतं संजग्राह पितामहः” । ‘साम’ शब्द का सामान्य अर्थ गीत लिया जाता है जो स्वर, ताल और लय में निबद्ध हो।उपनिषदों की यह मान्यता है कि सारा विश्व ब्रह्म का मधुर संगीत है और इसी का नाम साम है। छन्दोग्य उपनिषद ने ‘साम’ का निरुक्त ‘सा+अम’ द्वारा विभाजन कर के बतलाया है कि अधिभौतिक, आधिदैविक और आधात्मिक सभी स्तर पर ‘सा’ और ‘अम’ के संवाद से ही विश्व का संगीत चल रहा है ऋक और साम, शब्द और छंद, वाक और प्राण, विंदु और नाद, केंद्र और परिधि एक दूसरे के पूरक हैं। इन्ही दोनों का संवाद ‘सामत्व’है।
संगीत के स्वर और लय शब्दब्रह्म और परब्रह्म का द्योतक है।इसकी साधना से परमानंद की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है।लय जिसे वेद में छंदस यानि छंद कहते हैं उसके द्वारा मनुष्य दैवीय शक्ति से संवाद सम्पन्न कर सकता है।वेद के छंद अक्षर गणना के अनुसार हैं।सामगान में लय को सुनिश्चित रखने के लिए तीन मात्राओं का आश्रय लिया जाता है।यथा–ह्रस्व, दीर्घ,और प्लुत।ह्रस्व एक मात्रा का, दीर्घ दो मात्रा का और प्लुत तीन मात्राओं का होता है।
विकासवादी सिद्धांत के अनुसार प्राकवैदिक कालीन संगीत वैदिक काल तक आते-आते व्यवस्थित होता गया।अर्थात सृष्टि के आरंभ काल से सम्पूर्ण में सतत एक ध्वनि प्रवाह्यमान है।इसी ध्वनि को धर्मशास्त्रों, योगियों, ध्यानस्थ ऋषि मुनियों ने अपने अनुभूतियों के आधार पर ‘अनहद नाद’ कहा है।संगीत में इसी के आधार पर ‘आहत नाद’ और ‘अनाहत नाद’की व्याख्या संगीत शास्त्रज्ञों ने किया है।वैदिक युग की सर्वोपरि उपलब्धि यह थी कि संगीत की गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप की व्याख्या कर इसे भारतीय दर्शन का अपरिहार्य अंग बना दिया। वैदिक काल के ऋषि महात्माओं, संगीत साधकों ने नाद का सम्बंध ब्रह्म से स्थापित कर संगीत की ओजस्विनी शक्ति का परवर्ती ग्रन्थों में तात्विक विश्लेषण किया है।इस काल के संगीत मनीषियों द्वारा संगीत शिक्षण प्रणाली भी गुरुमुखी हुआ करती थी।गुरुमुख से श्रवण ततपश्चात श्रुति, स्वर, स्त्रोतों, पदों का अभ्यास संग गायन शिक्षा-शिक्षण की मूल प्रक्रिया थी।यही प्रणाली कालांतर में गुरु-शिष्य परम्परा को पोषित किया।
‘ मुण्डकोपनिषद’ में भगवान वेदव्यास जी को आदि गुरु के रूप में मानकर विद्यापर्वाह्य की दृष्टि से स्पष्ट कहा है कि ब्रह्मयज्ञ गुण संयत इन्द्रीय सम्पन्न, प्रशांत चित्त, समीप आये हुवे शिष्य को तत्व के अनुरूप उस ब्रह्म विद्या का उपदेश दें।यथा– ‘ तसमैं स विद्वान प्रसन्नाय सम्यक् , प्रशांत चित्ताय शमन्विताय । येन अक्षरंग पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाचांता तत्वतो ब्रह्मविद्याम।।’
इसीप्रकार श्रीमद्भागवत में आत्मकल्याण के लिए व्यक्ति या साधक को गुरुमुख होना , गुरू के मार्गों का,दिशानिर्देश का बिना सन्देह पालन,अनुशरण करना आवश्यक बताया गया है। ‘ गुरु ‘ वो जो शिष्य को अंधकार के रसातल से निकालकर ज्ञान ज्योति की ओर प्रवाहित करें, अंतर्मन में छाई वासना,विकार,अज्ञान के तमस का भेदन कर,नष्ट कर, ज्ञान से परिपूर्ण , आक्षादित कर दें। स्वयं गुरु शब्द से ही अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की निश्चितता प्रखरित होती है।यथा– तस्मादगुरु प्रापद्येत जिज्ञासु: श्रेयः उत्तमम। शब्दे परे च निश्नांत ब्रह्मन्युपष्माश्रयम ।।
इस प्रकार वैदिक काल में संगीत और शिक्षा का अत्यंत वृहद उल्लेख प्राप्त होता है। विद्यादान और विद्यार्जन के सम्बंध में वैदिक काल में गुरु और शिष्य के मध्य सम्बन्ध ,तारतम्य,अनुशरण इत्यादि से सम्बंधित ज्ञान वैदिक वांग्मय में उपलब्ध होते हैं। शिक्षा का आधार मौखिक हुआ करता था।गुरुकुल में एक तपी साधक के समान शिष्यों की दिनचर्या हुआ करती थी। गुरुआश्रमों में गुरु के द्वारा बताए गए स्वरों ,वैदिक ऋचाओं का अभ्यास ,गान, मनन,चिंतन,करना शिष्यों के दायित्व होता था।ये शिक्षण-पद्धति इतनी सशक्त थी कि गुरु से प्राप्त ज्ञान,विद्या मस्तिष्क में इस प्रकार सुरक्षित हो जाया करती थी जैसे आज के कम्प्यूटर में डेटा सुरक्षित हो जाया करती है परन्तु उस काल मे ज्ञान को वायरस का भय नही होता था और न ही उसे रचनाबद्ध करने की ही आवश्यकता होती थी। विद्या सुरक्षित रखने की एकमात्र युक्ति थी ,सतत अभ्यास और चिंतन-मनन।✍️ डॉ शिप्रा




