भारतीय संगीत में सौंदर्य और अध्यात्म

संसार की समस्त ललित कलाओं में संगीत एक ऐसी कला है जो सूक्ष्मतम होते हुए भी सर्वाधिक प्रभावशाली है। संगीत एक प्रकृति प्रदत्त कला है जिसका विकास धर्म और अध्यात्म के संरक्षण में हुआ। यह कला न केवल अहिलौकिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति करवाता है अपितु साधना और मोक्ष प्राप्ति का एक सशक्त साधन भी माना जाता है। संगीत प्राणिमात्र की अभिव्यक्ति का एक सफल साधन है।

संगीत मानवीय मनोविकार का शमन करने की एक श्रेष्ठ उपचार पद्धति है। इसका प्रभाव गहरा होता है। संगीत मन के गहरे तल को स्पर्श करता है तथा कटु विकारों को दूर कर आह्लाद और आनन्द का निर्झर भरता है।इससे मानसिक अशांति दूर होती है, एवं भावनात्मक अतृप्ति मिटती है।( संदर्भ-अखण्ड ज्योति सितम्बर2004)

संगीत का माध्यम नाद है। यह एक प्रायोगिक विद्या है जिसकी गहराई में उतरने के लिए निरन्तर कर्मशील रहने की आवश्यकता होती है। अभ्यास,चिंतन, मनन द्वारा इस विषय को समझने का प्रयास किया जा सकता है,अन्यथा यह ऐसी गूढ़तम विद्या है जिसकी गहराई का आंकलन भी कर पाना असम्भव है। यह एक महासागर है जिसकी गहनता अनुमान से भी परे है। इसकी साधना में हर-पल, हर-क्षण एक नई अनुभूति होती हैजो प्रत्येक अनुभूतियों से परे होती है।

प्राचीन शास्त्रकारों ने संगीत कला की दो धाराओं को शास्त्रगत मान्यता दी है–

1)मार्गी संगीत

2)देशी संगीत

प्रत्येक कला का प्रारंभिक ध्येय होता है उस कला के अंतिम सौपान को प्राप्त करना। प्रत्येक कला अपने आप में अनन्त है, उसके विस्तार और ज्ञान की सीमा बंधी नही होती। व्यक्ति उस कला में जब अपने को समर्पित करता चला जाता है तब एक समय आता है जब उसे सांसारिक भौतिक क्रिया कलापों से कोई मतलब नही रह जाता ।सारे आधि-व्याधी, दुख-द्वंद मिट जाते हैं और वह ‘मैं’ रूप को प्राप्त हो जाता है। जब ‘मैं कौन हूँ? मेरा अस्तित्व क्या है’? इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त हो जाता है तो व्यक्ति ‘सम्यक् ज्ञान’ का अधिकारी बन जाता है।संगीत की इन्हीं दो धाराओं में लौकिक-अलौकिक ज्ञान का अर्थ छिपा हुआ है।

मार्गी संगीत मूलतः नादोपासना है। प्राचीन काल मे इस संगीत को गंधर्व गान भी कहा जाता था। यह पूर्णतः आध्यात्मिकता के स्वरूप में ढला हुआ मूर्त से अमूर्त साधना मानी जाती है। यह संगीत प्राचीन काल मे देव्, गन्धर्वों, ऋषि मुनियों द्वारा साधना की जाती थी अतः मार्गी संगीत कहलाया।

देशी संगीत ,‘ नादरूपो जनार्दनः’ होते हुवे जन-मन-चित्त रंजन है। अर्थात वह संगीत जो चित्त का रंजन कर आमोद – प्रमोद का माद्यम बन, सामाजिक रीति, परम्पराओं का संगीत के माध्यम से पोषण करे देशी संगीत कहलाया …… आगे विस्तार

✍️ डॉ शिप्रा

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6 thoughts on “भारतीय संगीत में सौंदर्य और अध्यात्म

  1. राधे राधे दीदी,
    चरणस्पर्श🙏

    संगीतमय जीवन, जैसे की जी-वन..
    मैं पढ़कर प्रेरित हुई हूँ।
    अगली कड़ी की प्रतीक्षा है …

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  2. सुंदर आलेख । संगीत, आध्यात्म, काया तीनों के समन्वय से जीवन का रुप सत्य, शिव एवं सुंदर है। अर्थात योग की उपलब्धि एवं लय की प्राप्ति | आपका आलेख काफी व्यापक एवं सारगर्भित है।
    सुंदर प्रयास।

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